पंजाब सरकार ने किसानों को फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने वाली केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-एएएसएचए) को अपनाने से इनकार कर दिया है। राज्य सरकार का कहना है कि इस योजना से जुड़ी शर्तें पंजाब की मौजूदा कृषि व्यवस्था, खासकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और एपीएमसी मंडी प्रणाली को कमजोर कर सकती हैं। यह फैसला पिछले दिनों हुई एक बैठक में लिया गया, जिसमें पंजाब के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड़ियां, पंजाब राज्य किसान एवं खेत मजदूर आयोग के चेयरमैन सुखपाल सिंह और कृषि निदेशक गुरजीत सिंह बराड़ शामिल थे। अधिकारियों के अनुसार, पीएम-आशा के तहत लागू की जाने वाली प्राइस डेफिशिएंसी पेमेंट स्कीम (पीडीपीएस) और प्राइस स्टेबिलाइजेशन स्कीम (पीएसएस) को अपनाने के लिए राज्यों को माडल एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एंड लाइवस्टॉक मार्केटिंग एक्ट, 2017 को स्वीकार करना अनिवार्य है, जिसे पंजाब पहले ही खारिज कर चुका है। ये कानून निजी भागीदारी को बढ़ावा देता है अधिकारियों का कहना है कि यह 2017 का कानून निजी भागीदारी को बढ़ावा देता है और पारंपरिक मंडी व्यवस्था से बाहर व्यापार को आसान बनाता है। पंजाब सरकार को आशंका है कि इससे कृषि क्षेत्र में निजीकरण बढ़ेगा, एमएसपी आधारित सरकारी खरीद कमजोर होगी और राज्य को कर एवं शुल्क में भारी राजस्व नुकसान उठाना पड़ेगा। पंजाब में गेहूं और धान की खरीद मुख्य रूप से एपीएमसी मंडियों और कमीशन एजेंटों (आढ़तियों) के माध्यम से होती है, जो किसानों को अनौपचारिक ऋण भी उपलब्ध कराते हैं। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था में किसी भी तरह का बड़ा बदलाव न केवल किसानों, बल्कि हजारों आढ़तियों की आजीविका पर भी असर डालेगा। पंजाब सरकार का तर्क, ये स्वायत्तता को सीमित करता है पीएम-आशा के तहत, पीएसएस योजना में दालों, तिलहनों की एमएसपी पर सीधी खरीद की जाती है, जबकि पीडीपीएस योजना के अंतर्गत बाजार मूल्य एमएसपी से कम होने पर किसानों को अंतर की भरपाई दी जाती है। केंद्र सरकार शुरुआत में 90 फीसदी तक नुकसान की भरपाई करती है, जबकि शेष 10 फीसदी बाद में जारी किया जाता है। इसके अलावा, राज्य को यह भी स्वीकार करना होता है कि केंद्र की खरीद देश के कुल उत्पादन के केवल 25 फीसदी तक सीमित रहेगी और सभी करों व शुल्कों से छूट दी जाएगी। पंजाब सरकार का तर्क है कि ये शर्तें राज्य की स्वायत्तता को सीमित करती हैं और दीर्घकाल में एमएसपी प्रणाली को कमजोर कर सकती हैं। हालांकि कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि राज्य दालों और तिलहनों की खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि 2030 तक आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके। हालांकि अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री को लेना है लेकिन संकेत यह ही मिल रहे हैं कि पंजाब सरकार अपनी पारंपरिक कृषि नीति से पीछे हटने के मूड में नहीं है। वहीं, पड़ोसी राज्य हरियाणा 23 फसलों पर भावांतर योजना का लाभ किसानों को दे रही है। Post navigation बजट सत्र में अमृतपाल सिंह की एंट्री नहीं। पंजाब सरकार बोली— रिहाई से राज्य की सुरक्षा को खतरा।