लोहड़ी पंजाब का वह लोकपर्व है, जिसे अक्सर आग, गीत और मिठास तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि लोहड़ी केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना है। यह वह मौका है, जब लोकगीतों के जरिए समाज खुद से सवाल करता है- दहेज क्यों, लालच क्यों, भेदभाव क्यों और मेहनत का अपमान क्यों?

लोहड़ी के गीत मनोरंजन नहीं, बल्कि लोक-न्याय की आवाज हैं। इनमें दुल्ला भट्टी जैसे लोकनायक हैं, जो बेटियों की इज्जत के लिए खड़े होते हैं; किसान हैं, जिनकी मेहनत को उत्सव का आधार बनाया गया; और आग है, जो बराबरी और साझेदारी का प्रतीक बन जाती है। यही कारण है कि लोहड़ी के गीतों में सामाजिक बुराइयों पर सीधा प्रहार मिलता है।

यह विशेष पैकेज उसी लोहड़ी को सामने लाने की कोशिश है, जो माझा में लोक-वीरता बनती है, मालवा में मेहनत का उत्सव और दोआबा में रिश्तों की गर्माहट। साथ ही, उन प्रतीकों को भी समझने का प्रयास है, जो बताते हैं कि यह पर्व सिर्फ जश्न का नहीं, समझ का भी है।

लोकगीतों पर शोध कथा, हास्य और संस्कारों की जीवंत विरासत हैं

लोहड़ी के लोकगीत लोहड़ी केवल अग्नि-पूजन या ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं, बल्कि पंजाब की सामूहिक स्मृति, सामाजिक संबंधों और लोक-संस्कृति का उत्सव है। शोध में सामने आया है कि लोहड़ी से जुड़े लोकगीतों की दुनिया बेहद समृद्ध और वर्गीकृत है। इन गीतों के माध्यम से समाज की कथाएं, हास्य-बोध, पारिवारिक संबंध और सामूहिक चेतना पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।

ये गीत बताते हैं कि कैसे एक पर्व के माध्यम से कथा, हास्य और संस्कार एक साथ जीवित रहते हैं। लोहड़ी के गीतों को मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जा सकता है- कथात्मक गीत, हास्य-परिहास मूलक गीत और आशीर्वादात्मक गीत।

कथात्मक गीतों में प्राचीन घटनाओं, लोकनायकों और सामाजिक मूल्यों की झलक मिलती है। इसका सबसे लोकप्रिय उदाहरण ‘सुंदर मुंदरिए’ है। इस गीत में सुंदरी-मुंदरी नामक दो बहनों का वर्णन मिलता है और साथ ही लोकनायक दुल्ला भट्टी का स्मरण होता है।

सामूहिक गायन की शैली में जहां एक गायक पंक्ति बोलता है और बाकी ‘हो’ के स्वर में उत्तर देते हैं। इससे गीत को सामुदायिक उत्सव का रूप मिलता है। हास्य-परिहास मूलक गीत लोहड़ी को हल्के-फुल्के हास्य से भर देते हैं। इनमें रिश्तों पर चुटीले तंज, हंसी-मजाक और जीवन के छोटे-छोटे सुखों का उत्सव दिखाई देता है।

‘लोहड़ी बई लोहड़ी, दिओ गुड़ दी रिउड़ी’ जैसे गीतों में गुड़, रेवड़ी और घी के प्रतीकों के साथ परिवार के सदस्यों के लिए मंगलकामनाएं भी छिपी होती हैं। ये गीत लोकजीवन की सहजता और आत्मीयता को उजागर करते हैं। शोध में यह भी सामने आया है कि लोहड़ी के अवसर पर लड़कों और लड़कियों के गीतों में स्पष्ट अंतर होता है।

लड़कों के गीत ऊंचे सुर, तीखी तुकबंदी और जोशीले प्रवाह वाले होते हैं। टोलियों में घर-घर जाकर लोहड़ी मांगते समय वे कभी-कभी अक्खड़पन और नाराजगी भी जाहिर करते हैं। इसके विपरीत, लड़कियों के गीत मधुर, भावनात्मक और संस्कारों से भरे होते हैं। इनमें विवाह, भाई-बहन का स्नेह और नवजात शिशुओं के लिए आशीर्वाद प्रमुख विषय होते हैं। बधाई गीतों के माध्यम से वे परिवार और समाज के सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

कौन था दुल्ला भट्टी वाला?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार लोहड़ी को दुल्ला भट्टी वाला की कहानी से जोड़ा जाता है। लोहड़ी के गाने दुल्ला भट्टी से जुड़े हैं। दुल्ला भट्टी मुगलों के समय में एक बहादुर योद्धा थे और उन्होंने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया था। उस समय संदल बार की जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बलपूर्वक अमीर लोगों को बेचा जाता था।

उनमें सुंदरी और मुंदरी नामक दो बहनें भी थीं। दोनों लड़कियों की सगाई कहीं और तय हुई थी और मुगल शासक के डर से उनके भावी ससुराल वाले इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ लड़कियों को मुक्त करवाया, बल्कि मुसीबत की इस घड़ी में लड़के वालों को मनाकर एक जंगल में आग जलाकर दोनों की शादी भी करवाई। खुद ही उन दोनों का कन्यादान भी किया और शगुन स्वरूप उनको शक्कर दी थीं।

लोहड़ी के तीन रंग

माझा: वीरता की याद, पतंगबाजी का साथ पंजाब की वीरभूमि माझा क्षेत्र में लोहड़ी का स्वर सबसे ज्यादा लोकनायक दुल्ला भट्टी के इर्द-गिर्द घूमता है। ‘सुंदर मुंदरिए’ जैसे गीत यहां सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की याद हैं। माझा में लोहड़ी की आग के साथ लोकगीतों का सामूहिक गायन अधिक जोरदार होता है।

यहां शेर-शक्कर, रेवड़ी और मूंगफली का महत्व सिर्फ प्रसाद नहीं, बल्कि सामूहिक वितरण की संस्कृति से जुड़ा है। लोहड़ी यहां अन्याय के खिलाफ लोक-प्रतिरोध का प्रतीक भी मानी जाती है। इसके अलावा यहां सबसे अधिक पतंगबाजी होती है।

मालवा: किसान और फसल का उत्सव मालवा क्षेत्र में लोहड़ी का सबसे गहरा रिश्ता कृषि और किसान जीवन से जुड़ा है। यहां लोहड़ी को नई फसल, खासकर गेहूं की बुआई पूरी होने की खुशी के रूप में मनाया जाता है।

आग के चारों ओर फेरे लगाना, तिल, गुड़ और मक्की की रोटियों का महत्व यहां अधिक है। मालवा में लोहड़ी अक्सर सामूहिक भोज और गांव स्तर के मेलों के रूप में दिखाई देती है। यहां लोहड़ी मेहनत, पसीने और धरती से जुड़े जीवन का उत्सव बन जाती है।

दोआबा: पारिवारिक और एनआरआइ रंग दोआबा में लोहड़ी का स्वर अपेक्षाकृत पारिवारिक, भावनात्मक और संबंधों को सहेजने वाला होता है। इस क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग विदेश में बसे हुए हैं।

ऐसे में जब एनआरआइ परिवार साल में एक बार लौटते हैं तो लोहड़ी उनके लिए केवल पर्व नहीं, बल्कि परिवार के साथ समय बिताने और रिश्तों को जोड़ने का अवसर बन जाती है। लोहड़ी का सबसे अधिक जुड़ाव बच्चों व नवविवाहितों में दिखाई देता है। परंपरागत रूप से पहले बच्चे की लोहड़ी को बड़े उत्सव की तरह मनाने की परंपरा रही है।

रेवड़ी से गन्ने के रस तक… जानें महत्व

  • रेवड़ी: रेवड़ी तिल और गुड़ से बनती है। तिल को ठंड के मौसम में शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है, जबकि गुड़ मिठास और ऊर्जा का प्रतीक है। रेवड़ी बांटना रिश्तों में मिठास घोलने और आपसी कड़वाहट मिटाने का संकेत है।
  • मूंगफली: मूंगफली जमीन के भीतर पैदा होती है और उसे निकालने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। इसे मेहनत और धैर्य का प्रतीक माना जाता है। लोहड़ी पर मूंगफली खाना और बांटना संकेत है कि जो धरती के साथ जुड़ा रहेगा, उसे उसका फल जरूर मिलेगा।
  • गन्ने का रस: गन्ना पंजाब की प्रमुख फसलों में से एक है। लोहड़ी के आसपास गन्ने की पेराई शुरू होती है। गन्ने का रस नई ऊर्जा, ताजगी और समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि गन्ने का रस पीने से वर्ष भर मिठास और खुशहाली बनी रहती है।
  • तिल और गुड़ तिल: और गुड़ ठंड से बचाव के साथ-साथ सामूहिकता का प्रतीक हैं। इन्हें आग में डालना प्रकृति को धन्यवाद देने की लोक-रीत मानी जाती है। मानो धरती को उसकी देन लौटाई जा रही हो और उसे धन्यवाद िदया जा रहा हो।

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