करीब साढ़े तीन दशक पुराने एक अत्यंत संवेदनशील मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह दिवंगत उप महानिरीक्षक (डीआईजी) जोगिंदर सिंह आनंद के परिवार को लंबित पारिवारिक पेंशन एरियर पर 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज अदा करे।

यह ब्याज 23 मार्च 2017 जिस दिन डीआईजी आनंद की पत्नी इंदु आनंद, पुत्र सुमनजीत सिंह ‘निक्की’ और भतीजे संदीप सिंह ‘सैंडी’ को अदालत ने सम्मानपूर्वक बरी किया था, से लेकर वास्तविक भुगतान की तिथि तक देय होगा।

जस्टिस जगमोहन बंसल ने अपने आदेश में कहा कि जैसे ही अभियुक्तों को उच्च न्यायालय द्वारा बरी किया गया, उसी क्षण से वे पारिवारिक पेंशन और उसके समस्त एरियर के हकदार बन गए थे। राज्य सरकार पर यह दायित्व था कि वह बिना किसी देरी के पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ जारी करती। अदालत ने टिप्पणी की कि बरी होने के बाद पेंशन रोके रखने का कोई औचित्य नहीं था।

अदालत ने कहा, याचिकाकर्ताओं को सीबीआई द्वारा अभियुक्त बनाया गया था और ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया था, लेकिन अंतत हाई कोर्ट ने उन्हें सम्मानपूर्वक बरी किया। बरी होने के साथ ही वे पेंशन व एरियर के हकदार बन गए थे। राज्य सरकार पर इसे जारी करने का दायित्व था।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य को देरी के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश पारित किया। यह याचिका इंदु आनंद और उनके दोनों बच्चों द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने पंजाब सरकार और अन्य प्रतिवादियों से पारिवारिक पेंशन, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट तथा समस्त एरियर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित जारी करने की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया कि डीआईजी आनंद की हत्या के मामले में परिवार के सदस्यों को ‘आरोपित’ बनाए जाने के आधार पर उनकी पारिवारिक पेंशन और अन्य सेवा लाभ वर्षों तक निलंबित रखे गए। जबकि मार्च 2017 में हाईकोर्ट द्वारा पारित बरी किए जाने के निर्णय ने उन्हें सभी आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया था। उन्होंने दलील दी कि मुकदमा 34 वर्षों तक लंबित रहा, इसमें याचिकाकर्ताओं की कोई गलती नहीं थी, इसके बावजूद राज्य ने लंबे समय तक उनका वैधानिक हक रोके रखा।

हालांकि, जस्टिस बंसल ने बरी होने से पहले की अवधि के लिए ब्याज देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उस अवधि में देरी ट्रायल कोर्ट में लंबित मुकदमे और दोषसिद्धि के कारण हुई थी, जिसे राज्य की गलती नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि राज्य कोई निजी संस्था नहीं है और भुगतान सार्वजनिक कोष से किया जाता है। ‘व्यक्तिगत हित सार्वजनिक हित से ऊपर नहीं हो सकता’, यह कहते हुए अदालत ने माना कि ट्रायल या अपील लंबित रहने की अवधि के लिए ब्याज देना जनहित के विरुद्ध होगा।

उल्लेखनीय है कि मार्च 2017 में जब हाईकोर्ट ने इस मामले में तीनों आरोपितों को बरी किया था, तब अदालत ने सीबीआई की जांच पर गंभीर सवाल उठाए थे और कहा था कि यह ऐसा मामला है, जिसमें जांच एजेंसी की लापरवाही के कारण परिवार को भारी अन्याय सहना पड़ा। उस समय सुमनजीत सिंह मात्र 17 वर्ष और संदीप सिंह 18 वर्ष के थे। अदालत ने टिप्पणी की थी कि वे अपनी जवानी के महत्वपूर्ण वर्ष न्याय के भय और अनिश्चितता के साए में बिताने को मजबूर रहे।

13 जुलाई 1983 को चंडीगढ़ की सुखना झील से डीआईजी जोगिंदर सिंह आनंद का शव बरामद हुआ था। प्रारंभ में इसे आत्महत्या बताया गया, लेकिन संदेह उत्पन्न होने पर जांच सीबीआई को सौंप दी गई। सीबीआई ने 23 जुलाई 1983 को मामला दर्ज किया। लंबी सुनवाई के बाद 11 मार्च 1996 को तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने इंदु आनंद, उनके पुत्र और भतीजे को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दोषी ठहराया था।

बाद में उच्च न्यायालय ने वर्ष 2017 में इस निर्णय को पलटते हुए सभी आरोपितों को बरी कर दिया। गौरतलब है कि डीआईजी आनंद पूर्व केंद्रीय मेनका गांधी के परिवार से है l

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