पंजाब में नशे की मार सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई घरों की बर्बादी की सच्ची कहानी है। कभी मैदान में नाम कमाने वाला खिलाड़ी जब नशे की गिरफ्त में आता है, तो उसकी पहचान, परिवार और भविष्य सब कुछ धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।

करनैल सिंह की जिंदगी इसी कड़वी सच्चाई का उदाहरण है, जहां एक अंतरराष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी नशे के दलदल में इतना डूब गया कि उसने अपना सब कुछ खो दिया, लेकिन फिर उसी अंधेरे से बाहर निकलकर खुद को दोबारा खड़ा भी किया।

49 वर्षीय करनैल सिंह की कहानी अंतरराष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी के नशे के दलदल में डूब जाने और फिर उसे वापस बाहर निकल कर दुनिया के सामने खुद को साबित करने की ऐसी प्रेरणादायक कहानी है। जो देश भर में नशे से बाहर निकलने को असंभव काम बताने वालों के लिए मिसाल बन सकती है।

करनैल सिंह कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी हुआ करते थे। वह कई अंतरराष्ट्रीय स्तर की अकादमी में खेलते रहे। तत्कालीन शिक्षा मंत्री तोता सिंह ने उन्हें सम्मानित किया। लेकिन उसके बाद घुटने का लिगामेंट टूट जाने की वजह से उन्हें कबड्डी से कुछ साल दूर जाना पड़ा 2006 में उनके घुटने के लिगामेंट का ऑपरेशन हुआ और वह वापस कबड्डी के मैदान में आकर खड़े हो गए।

चोट के कारण छोड़नी पड़ी कबड्‌डी

2008 से 2010 तक 3 साल तक खेलते रहे। लेकिन उनके दूसरे घुटने के लिगामेंट की चोट ने उन्हें फिर मैदान से बाहर कर दिया। इसके बाद उन्होंने तय किया कि वह प्रॉपर्टी और ट्राले का काम शुरू करेंगे। काम ठीक-ठाक चलने लगा। इस दौरान प्लास्टिक के दानों के उनके एक ट्राले की लूट हो गई। माल का बीमा नहीं होने से करीब एक करोड् रुपए का घाटा हुआ और इस घाटे ने उनके कारोबार की कमर तोड़ कर रख दी।

घाटे ने कारोबार ही नहीं दिल और दिमाग पर भी गहरी चोट की। करनैल सिंह डोडा पोस्त के नशे की तरफ मुड़ गए। हालात तब भी नहीं सुधरे। बाद में 2012 में वह अपने गांव छिड़क चले गए। वहां कुछ लड़के चिट्ठा लिया करते थे। इन लोगों के साथ बैठकर जब उन्होंने एक दो बार नशा किया तो फिर वह इसी में रम गए।

नशे का दानव जब सर पर सवार हुआ तो फिर करनैल सिंह को कुछ भी नजर नहीं आता था। खुद की खरीदी और पुरस्कार में मिली करीब 45 लाख रुपए की कारें बेचकर 3 साल में नशे में उड़ा दिए। पत्नी के जेवर बिक गए। सब कुछ तबाही के कगार पर आ गया।

मां की मौत ने फिर बदल दी जिंदगी

जिसका जितना बड़ा नाम होता है उसकी बदनामी भी उतनी ही बड़ी होती है। करनैल सिंह बड़े कबड्डी खिलाड़ी थे तो बदनामी भी बड़ी होने लगी। पंचायत बैठी उनको समझाया,मां ने खूब समझाया, लेकिन कुछ समझ ना आया। बेटे की तबाही मां का दिल बर्दाश्त नहीं कर सका और उनकी जान चली गई। तब करनैल सिंह को लगने लगा कि जिस रास्ते पर वह जा रहा है उसमें बर्बादी का कोई अंत नहीं होता। करनैल सिंह ने कहा मैंने अपनी मां की कसम खाई और कहा कि अब मैं वापस जिऊंगा तो पहलवान बनकर। मैंने नशा छोड़ दिया।

केवल आत्मबल से विड्रॉल सिम्टम्स का मुकाबला

नशे के विड्रोल सिम्टम्स ने उसे पकड़े रखा। हालात ऐसे हो गए की 21 दिन तक बिना किसी दवाई के विड्रॉल के लक्षण झेलता रहा। खाना पीना सब बंद हो गया। मुझे लगा कि जिस मां से मैंने वादा किया था। उसी के पास चला जाता हूं ।आत्महत्या का का मन बनाया। लेकिन बेटी का चेहरा देखकर कदम वहां भी ठिठक गए।

उसके बाद सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया ईश्वर ने जो रास्ता दिखाया। उस पर आगे बढ़ता रहा। कुछ दिनों में सब ठीक होने लगा खाना पीना फिर से शुरू हो गया और करनैल ने तय किया कि दुबारा खेल कर दिखाऊंगा।

नशे की दलदल से निकलना नहीं था आसान 

फिर शुरू हुआ बदलाव का दौर, वापस वही वर्जिश खाना पीना और अपने दमखम को बढ़ाने के सारेजतन। 2017 में चंडीगढ़ में फिटनेस मॉडल चुना गया लोग बताते हैं कि आज भी कबड्डी के मैदान में 25 साल के लड़के भी करनेल को नहीं पकड़ पाते हैं। करनैल अपने गांव से 30 किलोमीटर दूर मोगा में जिम करने आते हैं वह साइकिल से आते हैं और साइकिल से ही घर जाते हैं।

लोगों ने भी काफी मदद की, बुरे वक्त में भी कई लोग घर पर सामान खाने पीने का सामान दे कर चले जाते थे। तो बाहर से साल भर में 2 से ढाई लाख रुपये सिर्फ इसलिए आते थे कि एक खिलाड़ी दोबारा से खड़ा हो सके।

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